शनिवार, 15 अगस्त 2015

आत्म विश्वास

बुद्धम् शरणम् गच्छामि,
धम्मम् शरणम् गच्छामि,
संघम् शरणम्  गच्छामि .
बुद्धम् शरणम् गच्छामि,
महात्मा बुद्ध कहते है की पहलें बुद्धि की शरण में अर्थात किसी की संज्ञा को समझने के लिए बुद्धि यानि ज्ञान से उस तत्व को पहले जानना जरूरी है.
धम्मम् शरणम् गच्छामि,
पहले जब किसी तत्व के ज्ञान को बुद्धि बल से जान लिया जाता है तो जो उस ज्ञान को अपने जीवन में लागू करो.
संघम् शरणम्  गच्छामि,
जब आप उस तत्व को, उस संज्ञा को जान जाते है तो और जीवन में लागू कर देते हो तो फिर उस ज्ञान को इस संसार में बाटो तो आप सफल हो सकते है.

एकबार गौतम बुद्ध का शिष्य अपने गुरु से बोलो गुरूजी मुझे आज्ञा दें, मुझे एक वेश्या के पास जाना है. तो महात्मा बुद्ध ने उस शिष्य को आज्ञा दी जाओ भत्ते. जब शिष्य इस प्रकार की आज्ञा मांगी तो विचलित चित के सह साथियो ने कहना शुरू कर दिया - हम लोग साधू सन्यासी है, औरतो से क्या लेना देना इस प्रकार संदेहास्पद बुराइया करने लगे. समय बितता गया और छ महीनो बाद वहीं शिष्य आया की और अपनें गुरु से बोला की गुरु जी ये एक और आप की शिष्या हो गयी.
निष्कर्ष 
अर्थात् गुरु को शिष्य पर विश्वास होता है, गुरु कान का कच्चा नहीं होता और जो गुरु कान का कच्चा होता वो सफल शिष्य भी नहीं बना सकता है.
बिना बिचारे किसी भी सदस्य, संस्थान, संघ, कार्यक्रम में योग्य-योग्यता पर प्रश्न चिन्ह लगाया जाना विश्वसनीयता को खोना पड़ता है.         

बुधवार, 29 जुलाई 2015

बच्चों का मोटापा कारण और निवारण

आधुनिक जीवनशैली के कारण बच्चों का मोटापा होता जा रहा हैं, अधिक किलोकैलोरी युक्त आहार, आधुनिकता के संसाधनों का अधिक उपयोग के कारण श्रम रहित जीवन शैली होने से बच्चों का मोटापा होता जा रहा है, 

बच्चों में मोटापा

भारतीय स्कूली बच्चों में मोटापा होता नजर आ रहा हैं, सत्तर के दशक में अल्प पोषण के कारण बच्चों में सामान्यतया से वजन की कमी दिखाई देती थी. परन्तु वर्तमान के समय में सरकारी स्कूलों की बजाय प्राइवेट स्कूलों के बच्चों में मोटापा बढ़ता दिखाई दे रहा है, शहरी विधार्थियों के साथ ग्रामीण पृष्ठभूमि के बच्चों में मोटापा बढ़ रहा हैं, सरकारी स्कूलों में पर्याप्त खेल के मैदान होने से शारीरिक परिश्रम हो जाता हैं, प्राइवेट  स्कूलों में पर्याप्त खेल कूद मैदानों का अभाव होता हैं, प्राइवेट पढने वाले स्कूलों में उनके अभिभावकों की आर्थिक स्थिति मजबूत होने से बच्चों को आधुनिक मनोरंजन साधन जो फोन, लेपटोप, टेबलेट और डेस्क टॉप कम्पयूटर में  इंटरनेट गेम्स् का उपयोग, वाट्स अप, फेसबुक जैसी ओनलाईन साइट्स का इस्तेमाल से शारीरिक श्रम का अभाव देखा जाता हैं, सोशियल साइट पर ज्यादातर समय बिताने के कारण बच्चों में शारीरिक परिश्रम का अभाव पाया जाता हैं, इस प्रकार के उपयोग युग की मांग होने के कारण उसका दुरुपयोग ज्यादा होता हैं, साथ सवारी वाहनों का उपयोग भी बढ़ गया हैं, स्कूल जाते समय स्कूटर, मोटर सायकल, टैक्सी के उपयोग के आवागमन के साधनों को ज्यादा उपयोग लिया जाता हैं, कुल मिलाकर आराम पसंद की जिंदगी हो गयी है जिसके कारण वर्तमान में बच्चों में मोटापा बढ़ता नजर आ रहा है, जो भविष्य में इन बच्चों के लिए ठीक नहीं हैं, आजकल बच्चों को मोटापा होने से आलस की प्रवर्ती देखी जाती हैं, भागते समय साँस चढ़ने की बीमारी दिखती हैं, उछल-कूद कर नहीं सकते, हालाँकि बौद्धिक विकास तो अच्छा होता हैं, परन्तु शारीरिक दशा से तन्दुरुस्त कम नजर आते हैं, इसलिए आधुनिक जीवन शैली के लिए उचित मार्ग दर्शन की आवश्यकता हो गयी हैं, किसी स्थानीय मनोवैज्ञानिक से परामर्शदाता का दिशा निर्देशों का पालन करना चाहिए.    

मंगलवार, 28 जुलाई 2015

बच्चों में कुंठा के भाव

मेरा बच्चा गुस्सा क्यों करता, मेरी समझ में नही आता क्या करूँ ?
अक्सर बच्चें के माता-पिता को ये बात करते सुनते हैं, तब क्या करना चाहिए .
वर्तमान समय में बच्चों में कुंठा के भाव देखने को मिलता है, जिसका मूल कारण होता है की कुछ कठिनाइयों का सामान नहीं कर पाता, जिसका समाधान नहीं कर पाता हैं. उस समस्या का समाधान नहीं होने की वजह से बच्चें को इस अवस्था में कुंठा हो जाती हैं. जिससे गुस्सा हो जाता हैं, जिसका मनोवैज्ञानिक परीक्षण से ज्ञात होता हैं की अत्यधिक आवश्यकताओं के पूर्ति में मध्य, कुछ
1. आवश्यकता को अभी भावक पूर्ति नहीं करते,
2. उचित मांग का ज्ञान नहीं होने से कहने में हिचकिचाट,
3. गलत प्रेरणा से अनुचित मांग का पूरा नहीं होना,
4. लक्ष्य प्राप्ति में बाधा का आना,
5. उन बच्चों में ही अधिक कुंठा होती जिनकी मांग हमेशा सरलता से पूर्ति कर दी जाती हैं,
5. उन बच्चों में जिसके परिवार में आपसी समन्वय की कमी पाई जाती हैं.
काम काजी महिलाओं के बच्चों में कुंठा अधिक पायी जाती हैं,
छात्रों में छात्राओ से अधिक कुंठा पायी जाती हैं, क्योंकि छात्राओं को गुस्सा कम आता है जब की छात्रों को गुस्सा अधिक आता हैं. अगर आप का बच्चा गुस्सा, क्रोध, चिडचिडापन, क्लेश करता हो तो आप को उसकी आदत बन जाए जो एक बीमारी का रूप धारण करलें उससे पूर्व निकट किसी मनोवैज्ञानिक से परामर्शदाता से ज़रुर सम्पर्क करे. इस प्रकार कोई की समस्याओं का समाधान आसानी के किया जा सकता हैं. 

मंगलवार, 14 जुलाई 2015

भ्रम में धोखा खाने से कैसे बचे !

भ्रम सभी को होता हैं, पर भ्रम से पहचान सभी को नहीं होती हैं, और जब भ्रम से पहचान होती तो वास्तविकता से पहचान हो जाती हैं, भ्रम में इंसान ढगा जाता है, भ्रम में इन्सान डर जाता हैं. कुल मिलाकर भ्रम नुकसानदायक होता हैं. अक्सर इन्सान भ्रम की वजह से अपनी जिद्द बनाये हुए रहता हैं, और अपने आप को सत्य साबित करता रहता हैं. परन्तु वास्तविक ऐसा होता नही हैं, जिद्दी किस्म के लोग अपनी बुद्धि में इतना गहरा सोच समझ लेता की जो मैं कह रहा वो ही सत्य हैं. उनका किसी दुसरो का कहा नहीं मानना एक जिद्दीपन का आचरण होता हैं, और जो इस प्रकार का होता वो वक्त बर्बाद कर रहा होता है, क्यों की वो अचेतन अवस्था में होता है. निम्न चित्र में आप को बताया जाये की इस चित्र में दो लाल रेखाए है कौन सी बड़ी कौन सी छोटी है, तो जाहिर है प्रथम बड़ी दिखेगी, और दूसरी छोटी लगेगी, जबकि ऐसा नहीं हैं, जब इन दोनों को मापनी से मापा जाए तो हकीक़त तो दोनों रेखाए समांतर हैं, इसी प्रकार से इन्सान अपनी अज्ञानता के कारण आज ठगा जा रहा है, जैसे कोई विश्वविद्यालय कोई डिग्री देता है और कोई दूसरा विश्वविद्यालय डिग्री देता है तो डिग्री का नाम तो समांतर हो सकता हैं, परन्तु उसकी मान्यता का समांतर होना उसका सत्यापन के बाद ही पता चलता है की सत्य क्या है, मान लो आप जो सोना ख़रीद रहे हो वो एक व्यापारी आप को सोना 22 कैरेट माप का दे रहा और आप से भाव 24 कैरेट का ले रहा है, जो आप को बढ़ा-चढ़ा कर बता रहा हैं. और दूसरा व्यापारी 22 कैरेट का सोना दे रहा और 22 कैरेट सोने का ही भाव ले रहा तो आप तो प्रथम वाले व्यापारी से ठगे जा रहे हो, जब की दूसरा व्यापारी आप को 22 कैरेट सोना बता कर 22 कैरेट सोना का ही पैसा ले रहा हैं. वो आप को बात बढ़ा-चढ़ा कर नहीं बोल रहा है. तो आप की पारखी नजर का होना जरूरी होता हैं. ये तब ही होगा जब आप अपना भ्रम को ज्ञान से दूर कर देंगे तो ठगे जाने से बच सकते हैं.  

सोमवार, 13 जुलाई 2015

जीवन

         जीवन का उद्देश्य पाना नहीं होता हैं. कुछ बनना होता हैं. हम जीते है इस संसार में एक भ्रम के साथ, जब हमे भ्रम का ज्ञान हो जाता है, तो हमारा जीवन सरलता पूर्वक जीने में आनंद आता है, जब बच्चा छोटा होता है तो साप और रस्सी में भेद नही जानता है. तो सांप का भय भी नहीं सताता, जब हम बड़े हो जाते है, तो हमे ज्ञान हो जाता की सांप और रस्सी में जानने का अंतर हो जाता हैं. साप को जानते है तो सर्प जहरीला होता का ज्ञान हमे डरता है की साप कही डस न ले, अगर सर्प की बजाय जब हम भ्रम में रस्सी को सर्प समझते है तब सर्प का ही डर लगता है.

         उसी प्रकार हमारी जीवनशैली में भी हम जिस आहार-विहार में रहते है तो भ्रम में जीते है, ये भ्रम हमारी एक मानसिक बीमारी होती है जो हमारे गलत आदर्शों के कारण संतुष्टिदायक अवस्था में जीने को मजबूर करती हैं, और एक आदत बन जाती है तो उस गलत आदत को सुधारने में बड़ी कठिनाई आती हैं.

         जब हम व्यस्क हो चुके होते हैं तो उस भ्रम में हमारी आदत विकसित हो चुकी होती है. और उस बनी हुई आदतों को तब तक छोड़ते नही की जब तक हमे बड़ी बीमारी नही लग जाती, तब तक देर हो चुकी होती हैं, बीमारी की अवस्था में हम सुधरने का पूरा प्रयास करते,  जो बीमारी से हम भुगतते उस बीमारी से हमारी औलाद नहीं ग्रसित हो उसके लिए हमे अपने बच्चों को बचपन से ही अच्छी आदतों का ज्ञान देना शुरू कर देना चाहिए.  
 आओ मिलकर एक प्रयास करे, आने वाले कल के लिए हमारे बच्चे स्वस्थ और सुडोल बने !

बचपन से आदर्श

          बचपन व्यक्ति के जीवन का वो प्रथम पड़ाव होता जहा से सामाजिक आवश्यकता की बुनियाद के सपने देखने का अवसर होता है, समाज निर्माण की क्रिया के सपने व्यक्ति परिवार से माता-पिता से और अपने अभिभावक से प्रेरणादायक कहानियों से शुरू होता हैं.
          बचपन में एक बार जो आदर्श बच्चे के जीवन में भर जाते फिर वो जिंदगी भर अनु पालना में व्यतीत करता है, जिस प्रकार एक मेमोरी कार्ड में जो रिकार्डिग हो जाती बस फिर कितना ही स्केनिग करो फिर वो भरा गाना ही बजता है.  
         बचपन में बालक एक कोरे खेत की तरह होता है, जैसे किसी खेत की निराई-गुड़ाई करते है उस में जो खरपतवार को निकाल देते है, जिससे उस खेत की फसल उत्तम होती, ठीक उसी तरह से बच्चों को भी बुरा आचरण को दूर करके अच्छे आचरणों को सिखाना चाहिए. अच्छे सपने दिखने चाहिए. जिससे आप का बालक होनहार योग्य सफल जीवन जी सके .
         बचपन में उस बच्चों प्रतिष्ठित व्यक्ति के सपने देखने चाहिए जिन्होंने सफलता से अपना जीवन को बनाया जिससे उसको सभी जानते हैं, जैसे कोई गरीब बड़ा अमीर बना हो, कोई फ़िल्मी कलाकार अपने बलबूते पर प्रसिद्धि प्राप्त की हो, कोई मशहूर डाक्टर बना हो, कोई सफल व्यवसाय बनकर पैसा कमाया हो इस प्रकार का एक रोल मॉडल होना चाहिएं. जिसका आदर्श मानकर वो बच्चा उन आदर्शों का प्रेषण करता रहे और उसके लिए वैसी शिक्षा के अनुसार उन आदर्शों को ध्यान में रखकर उसकी नकल का अभ्यास करता रहे तो वो भी उसके जैसा आसानी से एक सफल व्यक्ति बन सकता हैं.