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रविवार, 11 अक्टूबर 2015

आधुनिक जीवन शैली


G 1. आधुनिक जमाना नई जनरेशन में शर्मा जी ने नया रेडियो ख़रीद कर गाँव में लेकर आये, रेडियो में तत्कालीन अंग्रेजी राज में रेडियो उत्पादन से फ़िल्मी गीतों का आना, बहुत अच्छा लगता था, रोचकता इतनी थी कि गाय को चारा डालना में भूल हो जाती तो पिताजी से फटकार सुननी पड़ती थी. ताज़ा समाचार सुनने वाले गाँव के लोगो को संख्या बल शर्मा जी के रेडियो के पास बढ़ जाती थी. जिसमे सुबह शाम का समयावधि निर्धारित रहती थी, और इस प्रकार आकाशवाणी के कार्यक्रम सार्वजनिक सुने जाते थे, रेडियो वाणी सुनने के लिए लोगो में आपसी भाईचारा नये रग में जमने लगता था. फिर भी पोते पोतियों को लौरिया दादा-दादी सुना ही लेती थी.

G 2. का आधुनिक जमाना आया, G 1 के संयोग से रेडियो का स्थान अब टीवी ने ले लिया, टीवी एक कक्ष में 30 - 35 लोगो का जमावड़ा घर में आने लगा, घर का पानी कम पड़ने लगा, शुरू शुरू में सब अच्छा लगता परन्तु दादा-दादी जी की आवाज़ अब सुनाई किसी को नहीं पड़ती थी, की गाय आज घर नहीं आई, कौन उसको लेने जाए.

G 3. का आधुनिक जमाना आया, घर में कमरो का विस्तार हुआ, गाय बेच दी गई, आय की बढ़ोतरी में टीवी का पति-पत्नी में निजीकरण, दादा-दादी गुज़र गये, शर्मा जी बाहर होल में बेटे-पोते अपने निजी कक्ष में टीवी कार्यक्रम देखने में मगशुल, थोड़ी दूरियाँ होनी शुरू हो गई अपने परिवार से, अब चाय पानी, नाश्ता और खाना अनियमित हो गये.

G 4. का आधुनिक जमाना आया क्या आया विज्ञान का तूफान आया दुनिया शर्मा जी के पोते की मुट्ठी में, शर्मा की हांडी फोड़ दी गई, चूल्हा-चौका आधुनिक, नाश्ता पास्ता रेडी टू ईट मेक इन मेक्डोल इन ओंन कोल, पोता विदेश में तो बेटा देश में शर्मा जी गाँव में, स्मार्ट फोन, स्मार्ट रिश्ते, शर्मा जी अन्दर ही अन्दर पिसते की क्या वो भी जमाना था, पिता जी की डाट की गाय को चारा नहीं डाला, मामला रेडियो तक ही था, और धीरे धीरे विज्ञान का ज्ञान भौतिक बढ़ा और रिस्तो का ज्ञान अभौतिक बढ़ा, वाह वाह रे जमाना सुई की नौक से हाथी कब निकला पता ही नहीं चला, पोता बीजी, बेटा राजी, दादा-दादी पाजी, चली गई रिस्तो की डोर, ग़जब आई रिस्तो की भौर, मुँह में अब नहीं दाँत, पेट में नहीं आँत, हम तो सुन लेते डाट अब हम किसे सुनाये बात, सुविधाए आ गई, चले गये संस्कार, अब पूर्वजो का रह गया तिरस्कार ! 
अब आप बता ये क्या होगा G 5 का हालात.                           

शनिवार, 15 अगस्त 2015

आत्म विश्वास

बुद्धम् शरणम् गच्छामि,
धम्मम् शरणम् गच्छामि,
संघम् शरणम्  गच्छामि .
बुद्धम् शरणम् गच्छामि,
महात्मा बुद्ध कहते है की पहलें बुद्धि की शरण में अर्थात किसी की संज्ञा को समझने के लिए बुद्धि यानि ज्ञान से उस तत्व को पहले जानना जरूरी है.
धम्मम् शरणम् गच्छामि,
पहले जब किसी तत्व के ज्ञान को बुद्धि बल से जान लिया जाता है तो जो उस ज्ञान को अपने जीवन में लागू करो.
संघम् शरणम्  गच्छामि,
जब आप उस तत्व को, उस संज्ञा को जान जाते है तो और जीवन में लागू कर देते हो तो फिर उस ज्ञान को इस संसार में बाटो तो आप सफल हो सकते है.

एकबार गौतम बुद्ध का शिष्य अपने गुरु से बोलो गुरूजी मुझे आज्ञा दें, मुझे एक वेश्या के पास जाना है. तो महात्मा बुद्ध ने उस शिष्य को आज्ञा दी जाओ भत्ते. जब शिष्य इस प्रकार की आज्ञा मांगी तो विचलित चित के सह साथियो ने कहना शुरू कर दिया - हम लोग साधू सन्यासी है, औरतो से क्या लेना देना इस प्रकार संदेहास्पद बुराइया करने लगे. समय बितता गया और छ महीनो बाद वहीं शिष्य आया की और अपनें गुरु से बोला की गुरु जी ये एक और आप की शिष्या हो गयी.
निष्कर्ष 
अर्थात् गुरु को शिष्य पर विश्वास होता है, गुरु कान का कच्चा नहीं होता और जो गुरु कान का कच्चा होता वो सफल शिष्य भी नहीं बना सकता है.
बिना बिचारे किसी भी सदस्य, संस्थान, संघ, कार्यक्रम में योग्य-योग्यता पर प्रश्न चिन्ह लगाया जाना विश्वसनीयता को खोना पड़ता है.         

शनिवार, 5 जुलाई 2014

सुविधा और संस्कार

सुविधा और संस्कार एक सिक्के के दो पहलू है, और सिक्का दो पहलू से चलता हैं.
बच्चे को सुविधा और संस्कार इन दोनों की आवश्यकता होती हैं. संतुलित सुविधा और संस्कार की बजाय अगर बच्चे को सिर्फ सुविधा ही मिलेंगी तो बच्चे के बिगड़ने की सम्भावना अधिक होगी. जहा तक हो सकें सुविधा कम मिले और संस्कार अधिक मिले तो बच्चे के विकास की उम्मीद ज्यादा बढ़ जाती हैं. संस्कार में अनुशासन होता हैं, केवल सुविधा में भ्रम का आनंद होता हैं, और बच्चा एक बार जब सुविधाओं का भोगी हो जाता हैं, तो फिर भोग का कारण रोग हो जाता हैं, क्योंकि सिखा गया आचरण फिर जल्दी छुटता नहीं हैं. इस लिए बच्चे को पहले अच्छे संस्कार दीजिये तो सुविधाओं के साथ-साथ अच्छा जीवन जी सके.