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गुरुवार, 30 जून 2016

बच्चो का आहार

हर अभिभावक को अपने बच्चे को एक स्वस्थ आहार खिलाना चाहता है, जिसमें खनिज और जैविक  अच्‍छी मात्रा युक्त हों. लेकिन शक्‍कर और मीठा [ कार्बोहाइड्रेट ] ऐसी चीज़ें हैं,  फल जिसमे प्राकृतिक रूप से मिठास होती है, वो आप बच्‍चे को खिला सकते  हैं. बचपन से फीका दूध ही पिलाने की आदत डालनी चाहिए, अगर बच्चे को शुरुआत से ही शक्‍कर वाली चीजें खिलाना शुरु कर देंगे तो, उसे साग-सब्‍जियां, फल या खाली दूध कभी पसंद नहीं आएगा कमजोर व् अल्प रक्त का शिकार बच्चा हो जाएगा.

6 महीने के बच्‍चे के लिए आहार में मीठा खाने में शामिल नही करे अन्यथा अधिक मात्रा में शक्‍कर खिलाई गई तो, उसे बचपन का मोटापा और भविष्य में स्वास्थ्य संबंधी अन्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. इसलिये अभिभावक बाजारू उत्पादन खरीद करते समय ध्यान रखने की आदत खुद में रखनी चाहिये कि वह जब भी बच्‍चे के लिये कोई भी खाने की चीज़ें खरीदे, तो उसमें लगा हुआ आहार लेबल ज़रुर पढ़ जिस पर कार्बोहाइड्रेट की मात्रा निम्नस्तर की हो.जैसे - जैम, जैली, टॉफी, सॉस, सीरप या सॉफ्ट ड्रिंक आदि.
कार्बोहाइड्रेट शक्‍कर का ही स्वरूप होता हैं, जो ज्‍यादा सेवन करने से बच्‍चे की प्रतिरोध क्षमता कमजोर पड़ने लगती है, जिससे बच्‍चों को संक्रमण और अन्‍य बीमारियों घेरने लगती हैं. अनुसंधान से स्पष्ट  पता चलता है कि जो अभिभावक अपने बच्‍चों को मीठा खिलाने की आदत डालते हैं, उन बच्‍चों में आगे चल कर मोटापा, रक्त की कमी, हृदय रोग और मधुमेह जैसे बीमारी होने का खतरा पाया जाता  है. अधिक मीठा खाने से दातो में सडन पैदा होती जिससे दात खराब के साथ साथ, पाचनक्रिया कमजोर होती हैं. 


किसी प्रकार का तरल आहार में अतिरिक्त शक्कर नहीं मिलाये चाहे फल रसाहार हो, बाजारू आहार जैसे बिस्‍कुट और कुकीज़ बच्‍चों को सीमित मात्राओं में खिलाएं. जैम, जैली, टॉफी, सॉस, सीरप या सॉफ्ट ड्रिंक को अल्प मात्रा में उपयोग करे, खीर, मिल्‍कशेक या दही आदि में यथा शक्ति फलों का गूदा मिलाएँ, इससे मिठास आएगी. सब्जी में पानी मिलाकर रोटी के साथ खिलाने की आदत डाले. थोडा थोडासा तीखापन भी खिलाने की आदत डाले, जिसमें वो कभी कोई खाने में इनकार नहीं करेगा, और स्वस्थ मानसिक के साथ शारीरिक मजबूत बनेगा.

बुधवार, 29 जून 2016

आलस

आलस एक कामचोरो की पहचान होती हैं, आलस के बहुत कारण होते हैं, जिसमे आलस होने का पहला कार्य आहार का अधिक सेवन और दूसरा नशाखोरी, इस प्रकार से ये दो क्रिया मनुष्य के विकास में बाधक होती हैं, अधिक आहार खाने से स्वतः इंसान को किसी कार्य में मन नहीं लगता और नींद आने की क्रिया शुरू हो जाती हैं, दूसरा कारण नशाखोरी की वजह से कोई कार्य करने में मन नहीं लगता, एक जब तक नशा प्राप्त नहीं होता तो उसका मन नशे को प्राप्ति के लिए लगा रहता है, जब नशा प्राप्ति होता है तो उस नशे के कारण कार्य करना नहीं चाहता हैं, तीसरी कारण प्रेरणा का अभाव अथवा इर्ष्या प्रकृति का होना, प्रेरणा का अभाव से व्यक्ति व्यक्ति हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता हैं, एवं इर्ष्या भी व्यक्ति को प्रेरित करती है, की मै ही कार्य क्यों करू. चौथा कारण हर आवश्यकता की आसानी से सुलभ प्राप्ति होना. पांचवा कारण अनावश्यक पारिवारिक सहयोग, और छठा कारण मित्र मंडली इस प्रकार की ही होती हैं जो व्यसनी प्रकृति की होती जिसके कारण किसी भी कार्य करने में आलस करता हैं.

प्राप्ति

प्राप्ति का लक्ष्य
किसी विषय वस्तु की प्राप्ति के लिए आवश्यक विचार का होना जरूरी हैं, विचारोत्तेजक अवस्थाओ को लगातार कर्म प्रधान होना जरूरी है, कर्मफल इन्सान को अवश्य मिलता हैं. एक सिक्के के दो पहलू होते हैं, एक तरफ कर्म एक तरफ इच्छा शक्ति, किसी भी कर्म की इच्छा शक्ति को जब तक क्रियान्वित नहीं करेंगे तो कर्म फल की प्राप्ति नहीं होगी. कर्म फल के लिए सपने देखने के बाद कर्म को ही केवल लक्ष्य मानना जरूरी होता है, लक्ष्य के बाद उस कर्म में मेहनत का निरंतरता से गमन की अवस्था में लीन होना जरूरी होता हैं, इस प्रकार से लीन होने से विषय वस्तु की प्राप्ति अवश्य होती हैं.

मंगलवार, 28 जुलाई 2015

बच्चों में कुंठा के भाव

मेरा बच्चा गुस्सा क्यों करता, मेरी समझ में नही आता क्या करूँ ?
अक्सर बच्चें के माता-पिता को ये बात करते सुनते हैं, तब क्या करना चाहिए .
वर्तमान समय में बच्चों में कुंठा के भाव देखने को मिलता है, जिसका मूल कारण होता है की कुछ कठिनाइयों का सामान नहीं कर पाता, जिसका समाधान नहीं कर पाता हैं. उस समस्या का समाधान नहीं होने की वजह से बच्चें को इस अवस्था में कुंठा हो जाती हैं. जिससे गुस्सा हो जाता हैं, जिसका मनोवैज्ञानिक परीक्षण से ज्ञात होता हैं की अत्यधिक आवश्यकताओं के पूर्ति में मध्य, कुछ
1. आवश्यकता को अभी भावक पूर्ति नहीं करते,
2. उचित मांग का ज्ञान नहीं होने से कहने में हिचकिचाट,
3. गलत प्रेरणा से अनुचित मांग का पूरा नहीं होना,
4. लक्ष्य प्राप्ति में बाधा का आना,
5. उन बच्चों में ही अधिक कुंठा होती जिनकी मांग हमेशा सरलता से पूर्ति कर दी जाती हैं,
5. उन बच्चों में जिसके परिवार में आपसी समन्वय की कमी पाई जाती हैं.
काम काजी महिलाओं के बच्चों में कुंठा अधिक पायी जाती हैं,
छात्रों में छात्राओ से अधिक कुंठा पायी जाती हैं, क्योंकि छात्राओं को गुस्सा कम आता है जब की छात्रों को गुस्सा अधिक आता हैं. अगर आप का बच्चा गुस्सा, क्रोध, चिडचिडापन, क्लेश करता हो तो आप को उसकी आदत बन जाए जो एक बीमारी का रूप धारण करलें उससे पूर्व निकट किसी मनोवैज्ञानिक से परामर्शदाता से ज़रुर सम्पर्क करे. इस प्रकार कोई की समस्याओं का समाधान आसानी के किया जा सकता हैं. 

शनिवार, 11 जुलाई 2015

व्यक्तित्व मूल्य

मूल्यों के प्रकार
1. धार्मिक मूल्य religious values - भगवान में विश्वास देवी शक्तियों से डर, धार्मिक पुस्तकों में में लिखी वो नीतियाँ से विश्वास और धार्मिक मूल्य जो व्यक्ति उच्च मूल्य रखते वो पूजा-पाठ के साथ साथ तीर्थयात्री बनानेवाले होते है .
2. सामाजिक मूल्य social values लोगो ले प्रति दुआ, दया, दान, प्रेम, सहानुभूति जैसे मूल्य होते हैं. उच्च मूल्य वाले अपने हितों को अन देखा कर के जरूरत मन्दो को मदद करते हैं.
3. प्रजातांत्रिक मूल्य democratic values किसी भी भेदभाव के बिना, व्यक्ति का आदर करना, इसमे विचारों की स्वतंत्रता होती है.
4. सौन्दर्यात्मक मूल्य aestheti values सुंदरता की प्रशंसा करने वाले, कलाकार, चित्रकार, काव्य, ललित कला, सजावट से प्रेम करनेवाले, सफाई पसंद इत्यादि .
5. आर्थिक मूल्य economic values  भौतिक और धन की उपलब्धियों की इच्छा, उच्च मूल्यों वाले धनिकों को अधिक महत्व देते है, ये धन और भौतिक मूल्यों को अधिक महत्व देते हैं.
6. ज्ञान मूल्य knowledeg values इनको ज्ञान के प्रति प्रेम होता है, सैद्धांतिक नियमों की पालना, सत्य की खोज के प्रति प्रेम होना.
7. सुखवादी मूल्य hedonistic values  सुख से प्रेम करनेवाले और दर्द को तिरस्कार करनेवाले होते है. इस प्रकार उच्च मूल्य के लोग वर्तमान पर भरोसा करनेवाले भविष्य की चिंता से दूर होते है.
8. शक्ति मूल्य power values   दुसरो पर शासन करनेवाले, दुसरो पर नेतृत्व करनेवाले होते है. उच्च मूल्य वाले लोग दुसरो पर प्रभुत्व जमाने वाले होते है.  
9. स्वस्थ मूल्य health values इस प्रकार के लोग अपने शरीर को स्वस्थ बनानेवाले होते हैं, सदा संतुलित आहार विहार के धनी होते है. 

सोमवार, 6 जुलाई 2015

आदत

पालना और पलना
पालना का शाब्दिक अर्थ होता हैं, किसी एक व्यक्ति से किसी दूसरी संज्ञा हो पोषण प्रदान करना होता है. पलना किसी दूसरे से अपना पोषण करना होता अर्थात दूसरो पर निर्भर होना जैसे बच्चों का अभिभावकों पर निर्भर होना होता हैं, दो व्यक्तियों का आपस में एक के प्रति देना और दूसरे का लेना का आधार होता है. बच्चें जो ज्यातर अपने अभिभावकों से अनावश्यक वस्तुओं की मांग पूर्ति होती रहती है तो उन बच्चों की आत्म निर्भरता युवा होते आदतन एक निर्भरता वादी हो जाते और नशे की प्रवृत्ति में लिप्त हो जाते एवं आलसी हो जाते है . इस प्रकार की आदत का विकास निरन्तरता से इतना विकसित होता जिसका पता लगता तब तक देर हो चुकी होती है.